मंगलवार, 20 मई 2014

कोशिश 'अली' जीना तेरा हलाल कर गई,

तल्खी तेरी निगाह की कमाल कर गई,बस एक ही नज़र हमें बेहाल कर गई,आतिशे-दिल-ओ-जिगर कुछ भी नहीं,पेट की आग ही जिंदगी मुहाल कर गई,सूखे पत्तों से भरेगा खाई को कहाँ तक,
ये भूख ही तो जिंदगी पामाल कर गई,
न पूरी हो सकी न अधूरी रही ख्वाहिश,
बस यही रुसबा मेरे आमाल कर गई,
हसीं जहां में भी सकून न मिल सका,
तसब्बीरे हुस्न यार जमाल कर गई,
एक और अक्स धुल गया अश्कों से,
ऐसा भी क्या जो बर्के-जलाल कर गई,
गहरा था दिल पे मुहब्बत का असर,
यूं ही चाहत न अपनी मलाल कर गई,
रंजो-गम छुप न सके मुस्कराने से तेरे
फिर भी फितरत तेरी कमाल कर गई.
कभी फुर्सत नहीं मिली हमको खुदी से
कोशिश 'अली' जीना तेरा हलाल कर गई,

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