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बुधवार, 18 मई 2022

तन्हाई में हम, किसी को पुकारें

है रिमझिम सी वारिस ये ठंडी फुआरें,
तन्हाई में हम, किसी को पुकारें।

लरजती हैं शाखें, ओ गुल झूमते हैं,
लगता हैं आने को फिर से बहारें।

गरजता है बादल भी खामोशियों से,
चमकती हुई बिजलियाँ क्या पुकारें.

हरी घास पर मानो जादू हुआ है,
नई कोंपलों को ये कैसे निहारे.

हैं शबनम के मोती फ़िदा पत्तियों पर,
सूरज की किरणें भी इनको निखारें।

मस्ती में झूमे हैं गुल-ओ-शजर सब,
जो हर एक को धड़कनों से पुकारें.

खिलता है गुलशन मगर अनमना सा,
कि कलियाँ सभी राह तेरी निहारें।
मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नही कट सकता
बाहों में तेरी सकूँ मिल सकेगा,
है उम्मीद बस एक इसी को गुहारें।
मेरा दिले नादान मुझे खोजे कहां कहां
हुए और मादक बदन भीग कर जो,
'जी ' हम तो नादीदा उनको निहारें।


लरजती = झूमती, शाखें = डालियाँ, शबनम = ओंस, गुल-ओ-शजर = फूल और वृक्ष, गुहारें = दुहाई देना/आशावान होकर पुकारना, नादीदा = ललचाया हुआ.

गुरुवार, 12 मई 2022

प्रेम अंत से अनंत 1

 प्रेम आकर्षण है , प्रेम समर्पण है , प्रेम का वास हृदय में होता है , हृदय आत्मा से जुड़कर परमात्मा में लीन हो जाती है। यह प्रेम जब मानवीय होता है तब इसकी सुंदरता और निखरती है , प्रेम की कोई एक रूपरेखा नहीं है , किंतु सच्चा प्रेम पारलौकिक होता है। मनुष्य सौंदर्य प्रेमी है , जहां भी उसे सौंदर्य का साक्षात्कार होता है वह उसकी ओर आकर्षित हो जाता है , यह प्रकृति प्रदत है।

रितेश फौज में एक जवान के नाते तैनात है।

दो सप्ताह की छुट्टी मिलने पर वह अपने घर लौट रहा था।

रास्ते में ट्रेन एक स्टेशन पर आधे घंटे के लिए किसी कारणवश रुक जाती है।

एक प्यार-अनजानी राहों में

रितेश प्लेटफॉर्म पर उतर कर खड़े होते हैं , तभी उनके पास कुछ युवतियां आपस में हंसी मजाक करते हुए एक – दूसरे की खिंचाई कर रही थी , हंसी और मजाक के इस संवाद को कोई भी व्यक्ति सुने तो मुस्कुराए बिना नहीं रह सकता था। रितेश भी उनकी बातों पर मुस्कुरा रहा था। तभी युवतियों के मंडली में एक लड़की ने रितेश की ओर देखा और असहज महसूस करते हुए शर्माते हुए वहां से सभी को खींच कर ले जाती है। अब तो उस लड़की का भी मजाक मंडली में बनने लगता है , सभी सहेली को एक और हंसी का माध्यम मिल गया था ।

इस घटना को रितेश ने एक रोचक ढंग से देखा , साहचर्य उसे आभास हुआ कि उसका हृदय सामान्य गति से अधिक धड़क रहा है , लगता है युवती की शर्म हया और उसका घबराना मस्तिष्क से बाहर नहीं निकल रहा है। रितेश पूरे रास्ते उन युवतियों के हंसने , बोलने और उनके अंदाज सभी को एक-एक पल ,  एक एक क्षण जी रहा था और उससे भी अधिक उस युवती को नहीं भूल पा रहा था जो घबराते हुए सभी सखियों को ले गई थी।

रितेश घर तो पहुंच गया , किंतु उसका दिल अभी भी उस प्लेटफार्म पर लगा हुआ था।

मन मस्तिष्क यही कहता था कब उड़कर उसी प्लेटफार्म पर पहुंच जाऊं और उस दृश्य को फिर अपने आंखों से देखूं। किंतु अब वहां कौन मिलेगा , रितेश बहुत दिनों बाद अपने घर आया किंतु पहले के मुकाबले वह इस बार अधिक खुश नहीं था।

रात को विश्राम करते समय रितेश करवट बदलता रहा किंतु , वह सारी  घटना और वह हंसी – ठिठोली , वह मुखड़ा आंखों से ओझल होने का नाम नहीं ले रहा था। पूरी रात इसी प्रकार करवट बदलते निकल गई , किंतु नींद अभी भी नहीं थी। अब रितेश का हृदय उस योवना के साथ हो गया था अब उस यौवना  के बिना कहीं मन लगना मुश्किल था।

• मेरी डायरी का वो आखिरी पन्ना- 5

आखिर उस अजनबी तरुणी नवयौवना को ढूंढा कैसे जाए ? और क्या पता वह कहां रहती है ?

तरह-तरह के खयाल रितेश के मन में आते।

और उस यौवना / नव युवती से मिलने के ताने-बाने बुनने लगते , किंतु यह असंभव सा कार्य था।

जो व्यक्ति प्रेम के वशीभूत हो जाता है , वह फिर इस जग से बेगाना हो जाता है।

तरह तरह के ख्याल मन में आते रहते किंतु अंत में यही निकलता आखिर उसको ढूंढा कैसे जाए ,  कहां मिलेगी।

दो दिन हो गए रितेश के मन से वह दृश्य और चेहरा ओझल नहीं हो रहा था।

रितेश घर के काम से बाजार निकले वहां उन्हें घर के लिए कुछ आवश्यक सामान लेना था , और एक व्यक्ति से मुलाकात करना था। रितेश सारा सामान लेकर उस व्यक्ति से मिलने पहुंचे , किंतु व्यक्ति को आने में समय था इसलिए रितेश पेड़ के नीचे एक चबूतरे पर बैठ गए जो बाजार के बीचो-बीच था।

चबूतरे के पीछे प्राचीन शिव मंदिर था और कुछ दूर पर एक बड़ा सा गिरिजाघर भी था |

हम दोनों अब कहाँ मिलेंगे ?

रितेश को चबूतरे पर बैठे पंद्रह मिनट हुए होंगे तभी वही चेहरा , वही हंसी – बोली , वही अदाएं लिए वह मूर्ति साक्षात रूप में चलती हुई सामने से आती दिखाई दी। रितेश सोच में पड़ गया !  कहीं या मेरा स्वप्न तो नहीं ? किंतु कुछ क्षण बाद उसका यह भ्रम दूर हो गया , यह कोई स्वप्न नहीं बल्कि साक्षात वही नवयुवती चली आ रही है जो स्टेशन पर मिली थी।

बस क्या था , वह नवयुवती  जैसे ही रितेश के सामने से गुजरी , अकस्मात नवयुवती नई निगाहें रितेश को पहचानी  और फिर शर्माते हुए तेज कदमों से आगे निकल गई। रितेश अब और बेचैन हो गया और उससे मिलने की तीव्र उत्कंठा में वह अपना सारा समान वहीं छोड़कर उस युवती के पीछे पीछे गया।

किंतु कुछ ही देर बाद वह युवती भीड़ में अदृश्य हो गई।

रितेश चारों तरफ ढूंढता रहा किंतु वह युवती फिर एक बार आंखों से ओझल हो गई , काफी देर ढूंढने के बाद भी जब कोई सफलता हाथ नहीं लगी वापस लौट कर अपना सारा सामान लेकर उस व्यक्ति से बिना मिले वापस घर आ गया।

अब बेचैनी पहले से ज्यादा थी , किंतु एक उम्मीद थी की अब उससे मिलने की संभावना और अधिक होगी।

पहले जिसका अता – पता भी नहीं था अब कम से कम वह उसके इलाके के बारे में जानता तो है।

रितेश अब काम रहे , चाहे ना रहे वह छोटे-छोटे कामों का बहाना बनाकर बाजार पहुंच जाता और प्यासी नजरों से उत्सुक नजरों से उसने युवती को ढूंढता रहता। किंतु नवयुवती कहीं दिखाई नहीं देती , चार-पांच दिन रितेश को परेशान हुआ , बाजार में कहीं भी वह युवती नजर नहीं आई।

रितेश को चिंता सताने लगी कि अब छुट्टी की मियाद भी पूरी हो जाएगी और उस नव युवती से अगर नहीं मिला तो मन कैसे लगेगा और कैसे मैं अपने काम पर पूरे मन से जा सकूंगा ?

सुनो! खत लिखना मत भूलना .....

आज रितेश की मां को एक गांव शादी में जाना था , आने में रात हो जाएगी , गांव का विवाह रस्मों – रिवाजों और पूरी हिंदू पद्धति से होती है.

इसलिए रात्रि भोज में समय लगने के कारण रात होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है।

मां ने रितेश को अपने साथ शादी में चलने के लिए राजी किया रितेश अनमने ढंग से शादी में जाने को राजी हुआ।

शादी में पहुंचकर मां अपने सखी – सहेलियों में मिल गई रितेश का कोई हम उम्र नहीं था.

इसलिए वह मेहमान खाने में बैठ गया और अपना समय काटने लगा।

एक रस्म की अदायगी के लिए जब सभी लोग आंगन में इकट्ठे हुए , तो रितेश को भी वहां जाना पड़ा सामने कई सारी सखियों के साथ हंसी ठिठोली करते फिर वही चेहरा ठीक सामने नजर आया ! अब रितेश से रहा नहीं जा रहा था , वह चाह रहा था कब उस नवयुवती के हाथ पकड़े और उससे शादी करने का प्रस्ताव रखें।

बस यह भीड़ नहीं होती तो यह कार्य करने में देरी नहीं होती।

किंतु इतने सारे रिश्तेदारी के लोग क्या कहेंगे सब जगह तरह-तरह की बातें बनेगी यह सोच कर कदम एक जगह जैम गए ।

रात को जब वापस घर लौटने की तैयारी हुई , तब मां को छोड़ने उनकी सखी आई और उन सखी के साथ वह नवयुवती भी थी जो मां को विदा करने आई थी। माँ  ने अपने सखी से परिचय कराया यह मेरा बेटा है , फौज में है दो सप्ताह की छुट्टी पर आया है। एक सुंदर और घर को संभालने वाली लड़की की तलाश करके इसका भी घर बसा देती हूं ताकि जल्दी से पोते – पोती घर में दौड़े। माँ ने अपनी सखी और उसकी बेटी से परिचय कराया बेटी का नाम ” मृणाली “  है यह आज पता चला। मृणाली कितना ही प्यारा और सुंदर नाम है।

रितेश अब ऐसे खिल गया जैसे बसंत आने पर प्रकृति खिल जाती है। एक सुंदर और दिव्य नजारा जिस प्रकार हो जाता है उसी प्रकार रितेश का मन और शरीर झूम रहा था , उसके रोम-रोम खिल रहे थे।

रितेश ने रास्ते में मां को मृणाली के विषय में बताया और उससे शादी करने की बात भी कही।

मां गाल पर चपत लगाते हुए कहती है –

‘ पगले  पहले बताता तो मैं बात करते हुए आती , कोई बात नहीं , मैं समय देखकर बात कर लूंगी ! ‘

बस अब क्या था मां के बात करने का इंतजार।

माँ  ने बेटे के मन और बेचैनी का कारण जान लिया था , तो अब मां से कैसे रहा जाता




शनिवार, 8 अगस्त 2020

लैम्पोस्ट

 उस साल जब एक खास तारीख को रात के 12 बजे उसके मोबाइल पर एक फोन नहीं आया तो उसे यकीन हो गया कि वो एक 27 साल का अधेड़ है जो इस दुनिया का नहीं है। उसे फोन न बजने से ज्यादा खीज इस बात पर आई कि उसने कभी बड़ा होकर लैम्प पोस्ट बनने का सपना क्यों नहीं देखा। वो बचपन में अपने पिता के जेब से 50 रुपये का नोट चुराने के बाद हमेशा सोचता था कि वो बड़ा होकर डॉक्टर बनेगा। अगर वो अपनी माँ के पर्स से 20 रुपये का नोट चुराता तब वो सोचता था कि वो बड़ा होकर पायलट बनेगा। एक दिन जब उसने पाया कि न ही उसके पापा के जेब मे 50 रुपये है ना ही उसके मां के पर्स में 20 रुपये है तब उसने सोचा वो बड़ा होकर कोई भी नौकरी कर लेगा। वो कभी कभी खुद को अपने सपने में एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क की नौकरी करते देखता था।

वो जब बड़ा हुआ तब ना ही डॉक्टर बना ना ही पायलट ना ही क्लर्क बन पाया। कुछ नहीं बन पाने की स्थिति में हमेशा भगवान बन जाने की संभावना का मंदिर होता है, मस्जिद भी होता है। संभावनाओं के इबादतगाह में पूजा नहीं होती नमाज नहीं पढ़ी जाती। यहां लोग टिक टैक टो जैसे खेल खेलते या फिर कॉफी पीते हुए इंतजार करते। वो भी कभी कभी संभावनाओं के मंदिर में कभी कभी देर तक टिक टैक टो खेलता। वो संभावनाओं के मंदिर में कभी भी टिक टैक टोक के खेल में नहीं जीता। या तो वो हार जाता या फिर खेल में न जीत होती न हार होती। एक बार जब संभावनाओं के मंदिर में वो काफी लम्बे समय तक टिक टैक टो खेलने के बाद भी वो न जीत पाया न हार पाया तब वो कॉफ़ी लेकर इंतजार करने लगा।
इन्तजार शब्द बस एक शब्द नहीं था। किताबों और ख्यालों से निकलकर यह शब्द कभी कभी एक मर्तबान बन जाता था जिसमें सुंदर लडकियाँ उडती थी। इसी मर्तबान से एक दिन एक सुन्दर लड़की उड़ते उड़ते बहुत बाहर निकल आई। लड़की काफी सालों से उड़ रही थी इसलिए वो कुछ देर चलना या तैरना चाहती थी। लड़की बाहर एक सड़क पर काफी देर तक पानी ढूंढती रही। लड़की को एक बारगी अपने गालों पर पानी के निशान मिलें लेकिन तैरने के लिए इतना पानी काफी नहीं था। लड़की को पता था कि इतने पानी में सिर्फ डूबा जा सकता है इसलिए उसने तैरने का ख्याल दिल से निकाल दिया। वो चलने लगी। वो चलते चलते संभावनाओं के मंदिर पहुंची और टिक टैक टो खेलने लगी।
संभावनाओं के मंदिर में लड़के ने पहली बार इतनी सुन्दर लड़की को टिक टैक टो खेलते देखा था। इस से पहले भी उसने एक सुन्दर लड़की को एक मंदिर में ही देखा था लेकिन वो संभावनाओं का मंदिर नहीं था। वो आडम्बर का एक मंदिर था जिसे एक हारे हुए मूर्तिकार ने बनाया था। आडम्बर के मंदिर में पहली लड़की पूजा करती थी और व्रत रखती थी। लड़के ने इस लड़की से बिना कुछ औपचारिकता के चुमते हुए पूछा "हर साल एक ख़ास दिन रात १२ बजे फोन करोगी"। पूजा करने वाली लड़की को चूमे जाने की आवाज में दुनिया की सबसे खुशबूदार अगरबत्ती की सुगंध आई और उसने हाँ कह दिया। आडम्बर के मंदिर वाली लड़की काफी सालों बाद लड़के द्वारा चूमे जाने के बाद कहा उसे अस्थमा है। और इतना कहकर वो गायब हो गयी थी। लड़का भी गायब होना चाहता था पर उसे कभी अस्थमा नहीं हुआ इसलिए वो क्लर्क बनने के सपने देखने लगा। वो चाहता था कि उसके साथ कुछ होने से ज्यादा अच्छा यह है की वो कुछ हो जाए। कुछ हो जाने की चाहत में ही वो संभावनाओं के मंदिर में टिक टैक टो खेलता या कॉफ़ी पीता।
दूसरी सुन्दर लड़की को संभावनाओं के मंदिर में आये अभी कुछ देर नहीं हुआ था लेकिन लड़के को कॉफ़ी पीते पीते एक अरसा हो गया था इसलिए उसने सुन्दर को लड़की को चुमते हुए पुछा "हर साल एक ख़ास दिन रात १२ बजे फोन करोगी"। सुन्दर लड़की ने लड़के को खुद से दूर करते हुए पूछा
"क्यूँ! क्यूँ करूँ फोन"।
"मेरे अन्दर बहुत प्रेम है। सीना चीर कर दिखाऊं।"
लड़की ने लड़के की बातों पर ध्यान नहीं दिया। वो संभावनाओं के मंदिर में आँखें बंद कर के कुछ बुदबुदाई। उसकी बुदबुदाहट में प्रार्थना नाम की एक मछली की खुशबू आ रही थी। वो मर्तबान में भी कई बार यही प्रार्थना करती थी लेकिन मर्तबान में संभावनाओं का मंदिर नहीं था इसलिए शायद उसकी प्रार्थना सुनी नहीं जाती थी। संभावना के मंदिर में उसकी प्रार्थना सुनी गयी और उसकी बुदबुदाहट में छिपी प्रार्थना की मछली धप्प से जमीन पर गिरी और चाक़ू बन गयी।
सुन्दर लड़की ने बिना किसी औपचारिकता के चाकू से लड़के का सीना चिर दिया और कहा "कहाँ हैं प्रेम।" लड़के ने भी अपनी छाती में झाँका। लड़की बहुत जोर से चींखी "तुम्हारी छाती में प्रेम नहीं बस कंफ्लिक्ट भरा हुआ है। लड़की रोते हुए भागने लगी। लड़का चीखा "कहाँ जा रही हो"। "वापिस, इन्तजार के मर्तबान में"।
लड़का संभावनाओं के मंदिर में काफी देर तक मूर्ति जैसा खडा रहा। उसके सीने में चाक़ू था और जख्म से खून और कंफ्लिक्ट बह रहा था। सम्भावना के मंदिर में मौजूद टिक टैक टो खेलने वाले और कॉफ़ी पीने वाले लोगों ने कहा "तुम जब इतने देर से मूर्ति बने खड़े ही हो तो इस मंदिर के देवता क्यूँ नहीं बन जाते"। लड़के को अहसास हुआ की वो काफी समय से मूर्ति बना हुआ है। वो देवता नहीं बनना चाहता था। उसे जब इस बात का पता चला की उसके सीने में प्रेम की जगह कोफलिक्ट है तब उसे लगा की वो इस दुनिया का नहीं है। वो इस दुनिया में कभी अपनाया नहीं जा सकता। वो तेजी से भागा। उसे देवता बनना पसंद नहीं था। वो लैम्पपोस्ट बनना चाहता था। वो भागने लगा। लोगो ने पूछा "कहाँ जा रहे हो?"
"लैम्पपोस्ट बनने"।
लोगो ने सूना "शराबखाने जा रहा"।
लड़के ने कहीं से एक बात सुन रखी थी एक आदमी शराबखाने में शराब पीने के बाद रेल की पटरी बन गया था। लड़के को इस बात से उम्मीद थी की शायद वो भी शराब पीकर लैम्पपोस्ट बन जाए। वो सुनी बातों पर काफी यकीन करता था। आडम्बर के मंदिर में पूजा करने वाली लड़की के मुंह से उसने एक दिन सुना था की वो लड़के के साथ रहकर वो धीरे धीरे रेत बन रही है। वो एक दिन गायब हो जायेगी"।
शराबखाने में काफी देर तक शराब पीने के बाद वो एक सड़क किनारे खडा हो गया जहाँ काफी अन्धेरा था। उसके सड़क किनारे खड़े होते ही 2-3 लडकियां वहां आकर खड़ी हो गयी। उनमें से एक लड़की जिसने अपने होठों में शायद अपने किसी पुराने आशिक या फिर अपने पूर्वजन्म के किसी साथी का खून लगाया हुआ था, ने पूछा "चलोगे मेरे साथ"।
"मैं चलने के लिए यहाँ नहीं रुका हूँ। मैं यहाँ ठहरने आया हूँ। तुम देख नहीं रही हो की मैं लैंपपोस्ट बनने आया हूँ।
"पी के आया है क्या?" इतना कहकर पहली लड़की ऐसे हंसी जैसे किसी बच्चे ने उब में आकर तालाब में एक पत्थर को ऐसे फेंका हो जैसे पत्थर पानी को 7-8 बार अलग अलग हिस्सों में चूमकर डूबे।
दूसरी लड़की खामोश थी वो नहीं हंसी। दूसरी लड़की जिसने अपनी आँखों में किसी बर्बाद अन्तरिक्ष के पुराने ब्लैकहोल को लगाया था, ने लड़के से पूछा "तुम लैंपपोस्ट क्यूँ बनना चाहते हो?" लड़के को उम्मीद नहीं थी कि वो लड़की ऐसा सवाल करेगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या जवाब दे।
"मैं इस दुनिया का नहीं हूँ। मुझे इस दुनिया में डॉक्टर, पायलट या क्लर्क नहीं बनना। मैं चाहता हूँ कि मैं कुछ न बनने के बाद लैम्पपोस्ट बनूँ और फिर आते जाते लोगों को देख सकूँ। मुझे उन सभी 7-8 साल के बच्चों के चेहरे देखने हैं जिनकी जेब में 20 या पचास रुपये का वो नोट होता है जो वो अपने माँ-बाप के बटुवे से चुराते हैं। मुझे दुनिया भर के तमाम पायलटों, डॉक्टरों और क्लर्कों के चेहरे देखने है। मुझे 7 का साढ़े तीन प्रतिशत निकाल पाने वाले लोगों के चेहरे देखने हैं। मुझे इन्तजार के मर्तबान में फंसी सभी लड़कियों को बताना है कि कंफ्लिक्ट में भी प्रेम होता है। उतना प्रेम जितना इस बात में झूठ होता है कि मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगी.....
"
दूसरी लड़की लड़के कि इन बातों को सुनकर न हंसी न रोई। उसकी आँखों के ब्लैकगोल में पुच्छल तारा जैसा कुछ गिरा। वो कुछ देर वहीँ खड़ी रही फिर एक चलती गाडी को इशारे से रोककर चली गयी। जाते हाते उसने कहा "चले जाओ। तेज तुफान आने वाला है"।
उस रात सच में बहुत तेज तूफ़ान आया। कुछ तूफानों की खबर अखबारों में छपती है कुछ तूफानों का कहीं जिक्र नहीं होता। लड़के के हिसाब से आगे दिन अखबार के पहले पन्ने पर यह छपना चाहिए था "संभावनाओं के देवता कि चाक़ू लगने से मृत्यु" या कनफ्लिक्ट की कमी से लैम्पपोस्ट की मृत्यु। लेकिन लड़का इस दुनिया का नहीं था। उसकी सोच शायद इस दुनिया के लोगों से नहीं मिलती थी। वो खुद को इस दुनिया में एक प्रवासी समझता था। शायद यही वजह थी की अगले दिन अखबार के सातवें पन्ने पर एक छोटी सी खबर छपी "कल रात आये तूफ़ान की वजह से पुराने शहर का एक बिजली का खम्भा गिरा। हादसे में एक नशे में धुत्त व्यक्ति के शारीर पर खम्भा गिरने से मृत्यु"।

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

सुन्दरता के रूपक बांधे ज़िन नयनो में रीत गये

सुन्दरता के रूपक बांधे
ज़िन नयनो में रीत गये
कितनी खुलकर खेली पीड़ा
घबराकर दिन बीत गये
मन का प्यासा हिरना दौड़ा
रेतीले मैदानों पर
पानी का धोखा खा खा कर
फिसल गया ढालानों पर
आह किसे मलना था कोमल
अंगों पर तपता चन्दन
अब न लिखे जायेंगे फिर से
बासंती के गीत नये
सुन्दरता के रूपक बांधे ज़िन नयनो में रीत गये
अरे बाबरी देह बन गयी
कागज की भंगुर नौका
छूँछे बादल में जा सकता
इन्द्रधनुष कब तक रोका
छलना का इतिहास अगर कुछ
बीती बातें दोहराये
इससे ही क्या कल के सपने
हारी बाजी जीत गये
सुन्दरता के रूपक बांधे ज़िन नयनो में रीत गये
रह जाने दो संदर्भों में
थोड़ा बहुत उदासापन
गोधूली क्या कम कर देगी
तिर आया जो वासापन
उफ यह झुरमुट के पीछे अब
कैसा खण्डित चांद उगा
एेसे ही क्या परिचय देते
बेगानों को मीत नये
सुन्दरता के रूपक बांधे ज़िन नयनो में रीत गये

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

भेडिये – ३


पांच साल बाद
अधूरी कहानी ..
भेडिये – ३
एक युवा,मुस्कुराती अठखेलियों में व्यस्त रहने बाले भविष्य के भारत की किसी न किसी रूप में बागडोर सम्हालने बाली लड़की को रौंदकर /कुचलकर/मसलकर म्रत्यु के हवाले करके फैंक दिया गया इंसानों की बस्ती की तरफ ...एक छोटी से परी को चीर फाड़  डाला था दरिंदों ने |दर्द से बिलखती .चींखती ,घुटती,ठण्ड से सिकुड़ती ...रात की कालिमा में मौत को मांगती |संघर्ष करती रही और
दामिनी हमेशा हमेशा के लिए असमान में समाहित हो गयी ..|
कुछ वक्त के लिए कुछ लोग इंसान बनके उसके लिए आंगें आये ...एक भीड़ भी आई जिसमें छुपे हुए थे आदमखोर भेडिये ..लेकिन समय गुज़र गया और वो वापिस लौट गये अपनी मांदो में ...आज भी वो निकलते हैं अक्सर दिन को रातों को ...किसी भी रूप में ..कभी कभी सगे सम्बन्धी बनकर और शिकार कर ले जाते हैं किसी न किसी मासूम का ...
कमियां निगाह्बानो की निगाहों में हैं ,शिकारियों की बंदूकों में हैं ,बिछाए गये जालों में और उन्हें परोसा जाने बाला जहर भी असली नही है |बस इसीलिए ये भेडिये ज़िंदा हैं और रोज अपना अपनी वासना की पूर्ति के लिए ..जाने लेने में व्यस्त है /...
आम जनता ने मांग की के भेदियों को मार दो .खुद भेडियों ने मांग की भेडियों को मार दों... नर पिशाचों ने मांग की कि भेडियों को मार दो ...लेकिन हुक्मरानों ने भेडियों को मारने के लिए भेडियों को ही बंदूकें थमा दीं... ... अब रोज रात को आवाज आती है चैनलों पर बंदूक चलने की ...लेकिन सुबह मिलती है लाश किसी न किसी मासूम की ..और फिर कुछ नये भेडियों को बंदूकें थमा दी जाती हैं और फिर होता है जो पिछले दिन हुआ था ..|
अब इंसानों के हाथ खाली हैं ...भेडियों के हाथों में बंदूके हैं और उन मासूमो के हाथों में कफ़न ...जिससे वो अपनी अस्मत तो नही बचा सकती ..लेकिन उसे ओढकर खुद को काल के मुंह में जरुर समा सकती हैं |
मासूमो की निर्वस्त्र देहों को देखकर दिल करता है कि सविधान के पन्ने फाडकर इन्हें ढक दें क्यूंकि जो बचा नही सकता कमसे कम उनके तन को ढक ही सकता है ....|


रविवार, 9 फ़रवरी 2020

प्रेम कहानी ....

अभी अभी बस सांझ ने आकर घेरा था मुझको ...सूरज मध्यम-मध्यम रौशनी लेकर विदा ले चुका था ...सामने बहती नदी पर लालिमा आ गयी थी ..जो जल्द ही अँधेरे में विलुप्त हो जाने बाली थी |
मैं बालकनी में खडा हाँथ में चाय के दो कप थामे हमेशा की तरह ..यहाँ से गुजरने बाली हवाओं में से तुम्हे मेहसूस करता हुआ तूमसे मिलने के इंतज़ार में लगा हुआ था ...ये दिन और रात के मिलन के बाद शुरू होने बाला मेरा सफ़र निश्चित ही किसी दिन मुझे आज के सामाजिक परिवेश से अलग कर देगा....लेकिन में भी तो तुमसे मिले बिना नही रह सकता ...मेरी हर कहानी ..मेरी जिन्दगी की हर किताब ....तुम्हारे जिक्र के बिना या बिना तुम्हारे पूरी हो जाए ये तो सम्भव ही नही है |
इन सांझ की हवाओं में तुम्हारी खुशबु बसी हुयी है जो हमेशा मेरे इर्द गिर्द ही रहा करती हैं...मै हवा की छुंअन से ही तुम्हे मेहसूस कर ...तुम्ही में खो जाना चाहता हूँ..
अगर तुम और तुम्हारी यादें इस घर में न होती तो ये मेरे लिए किसी भी काम का नही था ....शायद मेरे रहने के लायक भी नही ....
आज मिलने जा रहा हूँ खुद से ,इक बार फिर से अपने दिनों को जीना चाहता हूँ ..जा रहा हूँ एचबीटीआई के केम्पस में वापस पुराने दिनों को याद करने के लिए ...इसलिए तुम्हे फिर बुलाने आया हूँ साथ चलने के लिए ...
क्यूंकि तुम्हारे बिना तो ये कैम्पस भी अधूरा ही हैं न |
लोग बदल चुके हैं ,वहुत सा स्टाफ भी बदल गया है ...लेंकिन आज भी वो प्राचीरें जिन के साहारे बैठ कर किये गये वादे आज भी जीवित खड़े हुए हैं ...बस थोड़े से पुराने हो गये हैं ...आज भी वो सारे ठिकाने ज्यों के त्यों हैं ...जैसे हमारे समय में हुआ करते थे ...|
मैं पिछले दिनों एक कार्यक्रम करने गया था वहां ...मुझे वहुत रूखापन सा लगा तुम्हारे बिना... सारी दीवारे निर्जीव सी जान पड़ी ...होस्टल बाले कमरे बदहवास नज़र आये ...क्लास रूम भरे हुए थे यकीन सवाल कर रहे थे .....मेरे अकेले आने का ..सब कारण जानना चाहते थे ..
शायद मुझे अकेला देखकर उन्होंने खुद को निर्जीव सा बना लिया है ..उस दिन मुझे नही लगा की इसी परिसर से मेरा इतना घहरा और करीबी नाता रहा हैं ...ऐसा लगा जैसे मेरा तिरिस्कार किया गया हो ...ऐसा लगा जैसे मुझ पर हंस रहे हो ..वहां के हालात ..और सबसे बड़ी बात उस दिन तुम भी नही थी हवाओं में .....
जो गले लगाने को दौड़ पड़ता हो..जहाँ पैर रखते ही अतीत जीवित हो वापस से गुजरने लगता हो ...सारी यादों को सजाकर रखने बाला परिसर वीरान था उस दिन ....क्यूंकि मेरे साथ तुम नही थी ..............
आज चलना साथ में तुम ...उन्हें दिखाना है की तमने सिर्फ दुनियां छोड़ी है मेरा दामन नही ...मेरा साथ नही .....मेरा प्यार नही .....मेरा दिल नही आर हाँ .................मेरा हाँथ नही ..
इन्हें बताना चींख चींख कर कि नही छूटा है वो बंधन ..नही टुटा है वो रिश्ता ...जिसके गवाह थे यहाँ के सारे लोग ...यहाँ की एक एक चीज ...
बोलना उनसे आज भी हांथों में हैं हाँथ .....नही छूटा है साथ .....और न छूटेगा ....कमसे कम इस जन्म तो हरगिज नही ...|
अच्छा एक बात और .. मेरा इंतज़ार करना ...मेरे लिए जगह बनाकर रखना ...मैं भी तुम्हारे साथ ...उसी पीपल के पेड़ पर रहना चाहता हूँ ....यहाँ से बैठ कर देखेगें नवीन अंकुरित होती प्रेम कहानीयों को ....उनको जियेंगे ..और खोजेंगे खुद को उनके अंदर .....मैं कागज कलम लेकर आऊंगा ....लिखूंगा और फिर तुम्हें सुनाऊंगा ....तुम्हें पसंद हैं न मेरी कवितायेँ ....लिखूंगा ...फिर से लिखूंगा ....लेकिन सिर्फ तुम्हारे लिए ....उसी पीपल के पेड़ पर ...तुम्हारी गोद में सिर रखकर ......तुम्हारी उंगलियों का बालों में स्पर्श को मेहसूस करते हुए ....लिखूंगा एक प्रेम कहानी जो सैंकड़ो सालों तक हमें जीवित रखेगी ||
लवयु हमेशा
तुम्हारा
जी आर दीक्षित

सोमवार, 20 जनवरी 2020

प्यार से जीना मुझे बस

सांसों से जब सांसें मिलतीं ,
सांसों में सरगम होती थी
सरगम जब धड़कन से मिलतीं ,
सीने में कम्पन होती थी
हर कम्पन पर , हर धड़कन पर ,
गीत सुनाया करता था
जाने कितने उपनामों से ,
मैं तुम्हें बुलाया करता था
नहीं पता था अरमानों का ,
कबतक इनकी शमा जलेगी
नहीं पता था तूफानों का ,
कबतक इनकी हवा चलेगी ?
उड़ जायेंगे तिनके तिनके ,
किस दिन मेरे अरमानों के
किस दिन मेरी हर चाहत की ,
बेगानी सी चिता जलेगी ?
रह जाएगी तन्हाई बस ,
दहलाने को दिल यह मेरा
घुल जाएगी तरुणाई भी ,
पीकर आसव चन्दन तेरा
कैसे खुद को बहलाऊँगा ,
कैसे खुद को समझाऊँगा
रह जायेगा झुलस झुलस कर,
जब यादों से आंगन मेरा ?
मृगतृष्णाएं नहीं बुझी हैं ,
जिनमें तुम शबनम होती थी
शबनम जब फूलों पर गिरती ,
आँखें ये पुरनम होती थीं
·
मैं नहीं कुछ मैं नहीं कुछ
बस यही मेरा धरम है
ज़िन्दगी में आदमी को
किसलिये इतना भरम है
है कहां अस्तित्व मेरा
कुछ नहीं मुझको खबर है
किन्तु फिर भी आसमां तक
दौड़ती मेरी नजर है
कौन सी मंजिल मुझे अब
पार करनी है यहां पर
कुछ बिखरते कागजों से
भर गई मेरी डगर है
मैं यहां पर किसलिये हूँ
इस धरा पर क्या करूँगा
प्यार से जीना मुझे बस
और बाकी क्या करूँगा
चाहता हूँ मैं यहां पर
झूमना चारों तरफ क्यों
हर तरफ काली घटा को
देखकर मैं क्या करूँगा
आदमी से पूछता हूँ
प्यार का सागर किधर है
सिर्फ खुशियों में समाया
कौन सा मेरा नगर है
ये जन्मों के सम्बंध यहां
जो हमने तुमने देखे थे
अपनी मीठी मुस्कानों से
अधरों पर तुमने रेखे थे
इस धरती के उद्यानों में
फूलों जैसे खिल जायेंगे
मन्द हवा लहरायेगी जब
खुशबू के झौंके आयेंगे
जाने कितनी आशायें भी
परिभाषायें लिख जायेंगी
जाने कितनी गाथायें भी
इतिहास अमर कर जायेंगी
जाने कितने मौसम आकर
अपना परिचय दे जायेंगे
जाने कितने मधुमासों में
हम खो खोकर रह जायेंगे
यह जीवन के प्रारब्ध यहां
जो कदम कदम पर धोखे थे
कितने उर के अरमानों से
ये हमने तुमने भोगे थे
धीरे धीरे इनकी पूरी
राम कहानी हमने देखी
कितने लक्ष्यों से गुजरी वो
मत्त जवानी हमने देखी
नहीं पता था हमको कितने
संज्ञान यहां हो जायेंगे
इक दिन एेसे बिछुड़ेंगे
सुनसान यहां हो जायेंगे
यह सांसों के अनुबन्ध यहां
जो हमने तुमने देखे थे
अपनी मोहक मुद्राओं से
अंतर में तुमने रेखे थे
उम्र कितनी ढल चुकी है
क्या गिनूँ मैं साल इसके
बस तुम्हारे ही नशीले
दिन मुझे बहला रहे हैं
पात कितने झड़ चुके हैं
क्या गिनूँ मैं पतझड़ों को
फूल जो तुमने खिलाये
वो यहां लहरा रहे हैं
हैं वही दिन के उजाले
हैं वही मादक निशायें
डोलती सी फिर रही हैं
हर तरफ पागल हवायें
ये ज़माने भी गुजरकर
हाल अपना कह रहे हैं
शुभ्र शोभित लग रही हैं
दूर की ओझल दिशायें
हैं सभी अहसास जीवित
जो मुझे दुलरा रहे हैं
मान लूँगा अब यहां पर
कुछ बहारें धीर देंगी
वारिशों की ये फुहारें
तन बदन को सींच देंगी
वेदनायें भी सिमट कर
एक आँचल ओढ़ लेंगी
और बांहें भी असीमित
आसमाँ को भींच लेंगी
वक्त के बिखरे हुए क्षण
अंतरण सहला रहे हैं

प्यार की नदियां मिलेंगी

आज की सारी उमीदें
कल यहां खोई मिलेंगी
कौन सा आँचल मिलेगा
कौन सी आँखें मिलेंगी
प्यार के सारे खिलोने
कल यहां टूटे मिलेंगे
कौन सा आंगन मिलेगा
कौन सी बांहें मिलेंगी
कल यहां पर जो बहारें
मुस्कुराकर खिल रहीं थीं
वो यहां पर किस तरह से
गुनगुना कर फिर खिलेंगी
यह घनी सी धुंध मन पर
जो घहरकर घिर रही हैं
क्या इसी में सुष्मितायें
वो तुम्हारी फिर मिलेंगी
चाँद का आधा कटोरा
जो यहां पर रिस रहा है
क्या इसी के रूप रस में
रातरानी भी खिलेंगी
कल यहां पूरी धरा पर
फाग का मौसम भरा था
क्या कहीं पर अब छलकते
प्यार की नदियां मिलेंगी

प्यार का दरिया बहाये

कौन अपनी सोच में अब
प्यार का दरिया बहाये
कौन अपनी हर उदासी
मुस्कुराकर फिर घटाये
कौन अन्तर भावना से
आरती आकर सजाये
कौन मन्दिर की परिधि में
नेह का दीपक जलाये
प्रार्थना में ड़ूबकर जो
ये सबेरे फिर जगाये
ये हवायें तन बदन से
क्यों लिपटती जा रही हैं
क्यों अचेतन धमनियों में
प्राण भरती जा रही हैं
कौन से वे पुन्य हैं जो
कम्पनों से थरथराये
हम निबिड़ में गुनगुनाकर
मुक्त अनुभव कर रहे हैं
क्यों अजानी राह पर हम
मौन चिंतन कर रहे हैं
ये हजारों फूल किसने
क्यों यहां पर हैं खिलाये
हम जगत की उलझनों को
बस वहीं पर छोड़ आये
यह गुजरता वक्त हमसे
प्रश्न कितने कर रहा था
मंत्र हम जो जप रहे थे
तंज उनपर कस रहा था

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

तू हो मेरे रुबरू, न शिकयतें न गुफ्तगू ,

आ तुझे पा लूँ , और फिर से तुझे खोऊँ मैं,
तू भी जागे मेरी याद में, तुझे भूल कर के सोऊँ मैं।

तू हो मेरे रुबरू, न शिकयतें न गुफ्तगू ,
न फासला हो दरमियाँ,तुझसे लिपट के रोऊँ मैं।

इक चाँदनी सी रात हो, तेरा और मेरा साथ हो
ये जनम जनम की बात हो इक ख्वाब ये सजाऊँ मैं।

कैसे कहूं तू दूर है, क्यूँ मान लूँ कि जुदा हैं हम,
तू साँसों में थी खो गई, तुझे धड़कनों में पाऊँ मैं।

मेरा ख्वाब तू, दीदार तू, तू मुक्ति है, संसार तू,
तू आती है हर साँस में, कैसे तुझे भुलाऊँ मैं।

अब तुझको क्यूँ याद करूँ, क्यूँ फिर से तुझे बुलाऊँ मैं
तू चली गई तो चली गई, क्यूँ अपना दिल जलाऊँ मैं।

रविवार, 15 दिसंबर 2019

स्त्री और प्रकृति

. . . . . " प्रकृति/ स्त्री ". . . .

' मुझे अच्छा लगता है . . .

  झुंड बनाकर / दौड़ती
  गिरती /बढ़ती/ लड़ती
  रोती/ हंस पड़ती बच्चियों को निहारना. . .

 मुझे अच्छा लगता  है. . .

 युवतियों के अल्हणपन
 उनके संकोच / अंहकार
 अजीब से व्यवहार / और
 योजनाबद्ध श्रृंगार को ताड़ना . .

 मुझे अच्छा लगता है . . .

 वयस्क स्त्रियों के तानों-बानो
 सच-झूठ के स्वलिखित अफसानो
कुछ गंभीर तो कुछ बनावटी चेहरों
 व्यवस्थित /अव्यवस्थित पर्तो को उघाड़ना. .

 मुझे अच्छा लगता है. .

 पोंपले मुंह वाली बूढ़ी औरतों के बुढ़ापे
 कभी दुआंये देते तो कभी खिसियाये सठियापे
 स्मृतियों को दुलारते, वर्तमान को लताड़ते
 झुर्रियों के पीछे खड़े पिछले समय को झाड़ना . . .

 मुझे अच्छा लगता है. .

 मुझे और भी अच्छे लगते हैं. .

 नदी / रेगिस्तान
 झील/ पहाड़
 झरने / जंगल
 सन्नाटा/ हलचल
 पेड़ / झाड़ियाँ
खेत / क्यारियाँ
 निर्जन/ उपवन
 पतझड़ / सावन
 घर / खंडहर
 फूल / पत्थर
 मैदान / गुफायें
 घुटन / हवायें

मुझे सम्पूर्ण प्रकृति ही अच्छी लगती है
एक मुकम्मिल स्त्री की तरह

प्रकृति ही स्त्री
या स्त्री में ही प्रकृति . .
खैर . .दोनो को ही पढ़ना
मुझे अच्छा लगता है. . .. . . .


मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

रात भर रहती है एक ही ख्वाहिश दिलमे

दिलकी धडकन भी अब लगती है गुफ्तगू तेरी
मेरी सांसों मे सदा महके है खुशबू तेरी

चांद खुद इसकी गवाही था फलक पर उसदम 
जब सितारों ने मिलके की थी आरजू तेरी

आ कभी झांक आईने मे मेरे ख्वाबों के
तुझको दिखलाउं तमन्नायें हूबहू तेरी

जहनो दिल से लिपटता है तसव्वुर तेरा 
मेरे सिने से लिपटती है आहु आहु तेरी

सुबह से शाम तलक शाम से सुबहा तलक
निगाहे तिश्ना को रहती है जुस्तजू तेरी

रात भर रहती है एक ही ख्वाहिश दिलमे
अपनी आँखों पे रोज धूप मै मलू तेरी

न खुदा की न मसीहा की हुकूमत है यहां
मेरे दिल पे फकत चलती है तू तू तेरी

रोज आशिकी मे पर फिर जाता हुं बेदार तक

जीस्त है बस मरमरी दो बाहों के इक हार तक
कामयाबी नाकामयाबी सिमटी नही जीतहार तक

मेरी तनहाई की जंग जब तेरी ख्वाईश से हुई
छत पे बैठा बैठा मै उडा चांद के उस पार तक

मेरे लिये जन्नतकी हद सदियोंसे है इस ही तरहा
होकर मेरे दिलसे शुरु फैली हुई दिलदार तक

झूठको बैठे बिठाये मिल गये ग्राहक कई
सच पहुंच ना पाया दुनिया मे कभी खरीददार तक

रोज खाली हाथ अपने होश मे आता हुं मै
रोज आशिकी मे पर फिर जाता हुं बेदार तक

मुझे क्या पता के है कहांतक ये सफर अहसासका
इनकार तक लगता है लगता है कभी इकरार तक

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

दिलकी महफिल सजाये गज़ब हो गया

वो निगाहों मे आये गज़ब हो गया
इस तरहा मुस्कराये गज़ब हो गया

यक ब यक कह उठा दिलका सहरा मेरा
दिलकी महफिल सजाये गज़ब हो गया

जब मयस्सर हुई मुझको तनहाइयाँ
ख्वाबों ने गीत गाये गज़ब हो गया

ख्वाहिशों के परिन्दें युं उड़ने लगे
दिल उठा करके हाये गज़ब हो गया

जानेमन जबसे गुजरा है राहों से वो
रंग है उलफत के छाये गज़ब हो गया

रात मे चैन है ना अब दिनमे करार
हाले दिल क्या सुनाये गज़ब हो गया

किसतरहा से ये दिलभी है उसका मुरीद
चोट हस हस के खाये गज़ब हो गया

उनसे लेना न देना हकीकत मे कुछ
पर लगे ना पराये गज़ब हो गया

दिखते है मुझे प्यार मे पागल जहां दिल

कहता है कहीं कोई कहे कोई कहीं है
मैने तो सुना था सारी ही उसकी ज़मीं है

दिखते है मुझे प्यार मे पागल जहां दिल
लगता है मुझे बस वो यहीं बस वो यहीं है

चांदको मैने फिर कभी देखा न गौर से
नजरों को भायी जबसे इक माहजबीं है

हज़ार परदों मे तू छुप के बैठ जा लेकिन
मै ख्वाब बन के आउंगा गर तू पर्दानशीं है

हसीन होने पे अपने गूरूर ज्यादा न कर
तू हसीं होगा मगर प्यार तेरा तुझसे हसीं है

अब ये सूरजके पुजारी कोभी कहां है खबर
रात किस हालमे सूरज रहा कहांपर मकीं है

जहां पे मौत का सैलाब आते रहता है
इश्क मे वो भी विराना लगता दिलनशीं है

असेसी और प्यार 😉

  इश्क़ और काम में एक रार सी ठन गई है, असेसी ही जबसे मेरा यार बन गई है ​खुद को कहती रही है वो baddie , और मुझको दिखी है हमेशा जो teddy ​वो ...