शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नही कट सकता ,

रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता है ,
चाँद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है ।
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एक दीवाना सा मुसाफिर है मेरी आँखों में ,
वक़्त बे-वक़्त ठहर जाता है चल पडता है ।
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अपनी ताबीर के चक्कर में मेरा जागता ख़्वाब ,
रोज सूरज की तरह घर से निकल पडता है ,
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रोज़ पत्थर की हिमायत में गज़ल लिखते हैं ,
रोज़ शीशों से कोई काम निकल पडता है ।
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मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नही कट सकता ,
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता है ।
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कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर ,
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता है ।
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ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक है मगर दिल अक्सर ,
नाम सुनता है तुम्हारा तो उछल पड़ता है ।
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उसकी याद आई है साँसों ज़रा धीरे चलो ,
धड़कनो से भी इबादत में ख़लल पड़ता है ....!!

... कार्ल मार्क्स हो गया हूं

कहां पूरा एटम था, अब क्वॉर्क्स हो गया हूं तेरी मोहब्बत में कार्ल मार्क्स हो गया हूं तेरा इश्क बुर्जुआ था, मैं रहा प्रॉलेटेरियट ही तू सोविय...