मंगलवार, 30 सितंबर 2014

काश! ये रंजो-ग़म बुढ़ापे में यूं बढ़े नहीं होते,

काश! ये रंजो-ग़म बुढ़ापे में यूं बढ़े नहीं होते,
ज़लज़ले अब भी मेरे दर पे यूं खड़े नहीं होते। 

कर लिया जैसे कैद खुद अपना बजूद ही मैंने,
वर्ना क्या और लोगों के बच्चे बड़े नहीं होते?

अब ये आलम है बेबसी का जिसे जीता हूँ मैं,
सदा कितनी भी दूँ मेरे पास वो खड़े नहीं होते।

उनकी अपनी जिंदगी है और मेरी मजबूरियाँ,
कभी भी दर्द दुनिया में रोटी से बड़े नहीं होते।

मुझे अहसास हो चला हर अन्जाम का अपने,
जिनमें गैरत हो वो जीने को यूं अड़े नहीं होते।

होते दिलों में रामो-रहीम, नानक-ओ-मसीहा,
आज हम इस तरह आपस में लड़े नहीं होते।

दबाये अब भी फिरता हूँ सीने में न जाने क्या,
होते जज्बात तूफानी, तो ऐसे सढ़े नहीं होते।

गंबाया वक्त घुट-घुट कर परवरिश में जिनकी,
होता खुदसर तो चश्म जमीं में गढ़े नहीं होते।

भूल कर जिनसे करता उम्मीदे-हक़-ओ-रहम,
उन मशीनी आँखों में 'अली आंसू जड़े नहीं होते।

खुदसर = स्वार्थी, चश्म = आँखें,
उम्मीदे-हक़-ओ-रहम = अधिकार और कृपा की आशा


as khan ji

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