मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

झूम उठता हूँ अक्सर शाम को

झूम उठता हुँ अक्सर शाम को,
जबकि शराब नही पीता।


तड़प उठता हुँ अक्सर शाम को,
जब कोई दर्द नही होता


पड़ जाती है कभी-कभी
काँन्धो की जरुरत हमको


जबकि किसी के सहारे
जीना मुझको नही जीता। 


उस वक्त बस एक खुमारी छाई होती है,।
तुमसे रात के किसी पहर में मुलाकात की। 


बस यही सोचता हुँ में।
तुझ से मिलूँगा रात में,


तेरा दीदार होगा रात में।

तुम्ही में खो जाऊंगा में ।


तुम स्वप्न में आओगी जब
तुझको पाने के लिए तड़प जाऊँगा में।


तुम को अपनी बाँहों में समा लूँगा
तेरी नजरो से पीयूँगा जाम-ए-इश्क।


जब चढ जायेगी तो झूम जाऊँगा में।
फिर से लुढक जाऊँगा में।

जी.आर.दीक्षित



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

असेसी और प्यार 😉

  इश्क़ और काम में एक रार सी ठन गई है, असेसी ही जबसे मेरा यार बन गई है ​खुद को कहती रही है वो baddie , और मुझको दिखी है हमेशा जो teddy ​वो ...