बुधवार, 1 मई 2013

नष्ट होती संस्कृति

आज से कुछ वर्ष पहले बोये गये बीज आज  एक फसल के रुप में सामने है,अब हमें तो इन्हें काटना ही होगा।जब हम इन बीजो को बो रहै थे तभी हमको चेतावनी दी गई थी कि ये हमें पतन की राह तक ले जायेगी,परन्तु हम बोते रहे।जिस तकनीकिय प्रगति को हम खुद को नवीन युग की तरफ बढता पा रहै थे,वही तकनीकी हमारे संस्कारो और सभ्यता का गला घौंटती रही।जिस तरह से मानवीय चेतना में गिरावट आई है,उससे तो लगता है कि सच में मानवीय सभ्यता के विनाश की घड़ी निकट है।सरकार की विफलता,पुलिस प्रशासन का ढीलापन,भ्रष्ट तन्त्र,स्वार्थ की राजनीति,और निठ्ठले नेताओ ने कानून और संविधान दोनो के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा दिये।अबोध बालिकाओं पर होते लैंगिक अत्याचार,हत्या,नित्य किसी अखबार के पन्नो पर छपी खबरें नारी की हालत को बंया करती है।जल्द ही भारतीय समाज से वो दिन दूर नही जब हमें अपने घर की बहु,वेटी नाम लुप्त प्रायो में होगे।हमें ये नित्य घटती दुर्दान्त घटनाओ का अन्त भी कहीं नही दिख रहा।जिन्हे सजा का डर नही है,उन्हें कौन डरा सकता है?क्या ये पुलिसीय प्रशासन के नाम पर खड़ी निठ्ठलो,भ्रष्टो की फौज?जिन्होने भारतीय संविधान,कानून की गरिमा को धूल में मिला दिया।वे बेखौफ गुनाह करने में प्रवृत्त होते है।कभी-कभी तो मुझे लगता है कि ये वहशीपन की हद पार करके नीच कर्म करने बाला इन्सान तो हो नही सकता,हरगिज नही हो सकता।इसे तो जानवर कहना भी सही नही होगा क्युँकि जानवर भी अपनी मर्यादा को नही भूलता।फिर ये है कौन?,इसका निर्माण करने बाला कौन है?,शायद हम और हमारी ये नवीन युगी तकनीकी जो हमें झोली भर-भर के अश्लीलता बाँटती है,और उसे हम ले भी जाते है।हमें तो ये सोचने में भी शर्म की आनुभूति होती है कि उसने ये किया कैसे?कैसा होगा वह मन जो कामुकता के प्रति इतना बदसूरत रवैया अपना है?

जी.आर.दीक्षित

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