खुद ही खुद से दूर क्यों इतना
मायूसी क्यों छुपाते रहे हो
पूछना मेरा गुनाह नहीं था
आंकलन मेरा गलत नहीं
जब जाना इस मुस्कान के पीछे
विरह वेदन से व्याकुल हृदय
फिर भी तुम मुस्कुरा जाते हो
औरों के होठों की मुस्कान
तुम सदैव बन जाते हो
शब्द हर बार तुम्हारे -
"हमेशा की तरह मैं बेहतर हूँ"
छुपाते हैं दिल के राज़ तुम्हारे
मुस्कान को कहते हो ये फिदरत
शायद जीने की है ताकत ये हमारी
कभी किसी ने जख्म कुरेदा
तुम उतना ही अधिक मुस्काते रहे
कबूल किया आखिर तुमने भी
अपनों से बिछङने के गम को
जो देखे थे सपने बचपन में
आदर्श रूप में बुलंद था जज्बा
आखिर तुम अंतिम उम्मीद बने
उनके गौरव को बढाने वाले
जिनसे मिली पहचान तुम्हारी
हर एक सपने को साकार किया
कोई कसर नहीं छोङा तुमने
एक हूक है दिल में जो तङप रहे हो
अपनी खुशियों को पाने के लिए
इस जंग के हश्र से हैं अञभिज्ञ
आज खङे हो तुम जिन राहों पर
अपने पराए का भेद नहीं है
मिटा दोगे खुद को यूँ ही तो क्या
तुमको कोई मलाल ना होगा
तुम्हारा एक "आदर्श "प्रतिबिंब
तुम्हारा " गौरव " बनकर सदा अमिट रहेगा!
"गायत्री शर्मा"
मायूसी क्यों छुपाते रहे हो
पूछना मेरा गुनाह नहीं था
आंकलन मेरा गलत नहीं
जब जाना इस मुस्कान के पीछे
विरह वेदन से व्याकुल हृदय
फिर भी तुम मुस्कुरा जाते हो
औरों के होठों की मुस्कान
तुम सदैव बन जाते हो
शब्द हर बार तुम्हारे -
"हमेशा की तरह मैं बेहतर हूँ"
छुपाते हैं दिल के राज़ तुम्हारे
मुस्कान को कहते हो ये फिदरत
शायद जीने की है ताकत ये हमारी
कभी किसी ने जख्म कुरेदा
तुम उतना ही अधिक मुस्काते रहे
कबूल किया आखिर तुमने भी
अपनों से बिछङने के गम को
जो देखे थे सपने बचपन में
आदर्श रूप में बुलंद था जज्बा
आखिर तुम अंतिम उम्मीद बने
उनके गौरव को बढाने वाले
जिनसे मिली पहचान तुम्हारी
हर एक सपने को साकार किया
कोई कसर नहीं छोङा तुमने
एक हूक है दिल में जो तङप रहे हो
अपनी खुशियों को पाने के लिए
इस जंग के हश्र से हैं अञभिज्ञ
आज खङे हो तुम जिन राहों पर
अपने पराए का भेद नहीं है
मिटा दोगे खुद को यूँ ही तो क्या
तुमको कोई मलाल ना होगा
तुम्हारा एक "आदर्श "प्रतिबिंब
तुम्हारा " गौरव " बनकर सदा अमिट रहेगा!
"गायत्री शर्मा"
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