गुरुवार, 6 मार्च 2014

प्रतिविम्व अमित रहेगा

खुद ही खुद से दूर क्यों इतना
मायूसी  क्यों छुपाते रहे हो
पूछना मेरा  गुनाह नहीं था
आंकलन  मेरा  गलत  नहीं
 जब जाना इस मुस्कान के पीछे
विरह वेदन से  व्याकुल हृदय
फिर भी तुम मुस्कुरा जाते हो
औरों   के  होठों  की  मुस्कान  
तुम  सदैव  बन  जाते हो
शब्द  हर बार तुम्हारे -
"हमेशा की तरह मैं बेहतर हूँ"
छुपाते  हैं  दिल के राज़ तुम्हारे
मुस्कान को कहते हो ये फिदरत
शायद जीने की है ताकत ये हमारी
 कभी किसी ने जख्म कुरेदा
तुम उतना ही अधिक मुस्काते रहे
कबूल किया आखिर तुमने भी
अपनों से  बिछङने  के  गम को
 जो देखे थे  सपने बचपन  में
आदर्श रूप में बुलंद  था जज्बा
आखिर तुम  अंतिम उम्मीद बने
उनके  गौरव को  बढाने  वाले
 जिनसे मिली पहचान तुम्हारी
हर एक सपने को साकार किया
कोई  कसर  नहीं  छोङा तुमने
एक हूक है दिल में जो तङप रहे हो
अपनी  खुशियों को  पाने के लिए
इस जंग के  हश्र से हैं  अञभिज्ञ
आज खङे हो तुम जिन राहों पर
अपने पराए  का  भेद नहीं  है
मिटा दोगे खुद को यूँ ही तो क्या
तुमको कोई मलाल ना  होगा
तुम्हारा एक "आदर्श "प्रतिबिंब
 तुम्हारा " गौरव " बनकर  सदा अमिट रहेगा!

"गायत्री शर्मा"  

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