बुधवार, 9 अप्रैल 2014

आहिस्ता आहिस्ता अब(Now slowly)

आहिस्ता आहिस्ता अब
समय निकलने लगा

दिवस और रात्रि का 
मालूम नहीं पङता

आशा का चिराग बन
खुद रौशन होने लगी

उम्मीद की इस लौ को
मैने बुझने नहीं दिया 

मुश्किल पलों में भी  
खुशियाँ तलाश रही

Now slowly 
Took time out 

Day and night 
Affecting not know 

Become the lamp of hope 
Himself began to brighten 

The flame of hope 
I did not burn out 

Even in difficult moments 
Happiness is exploring 
गायत्री शर्मा

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