गुरुवार, 7 जुलाई 2016

मासूम मुहब्बत को तल्ख सज़ा अब हो जाने दो

अरमाँ लिख कागज पे टुकड़े कर दिया किसी ने
टूटे कागज के टुकड़ों को यूँही  बिखर जाने दो
गजल आकार लेने के पहले ही छितर बितर हुई
मासूम मुहब्बत को तल्ख सज़ा अब हो जाने दो

निगाहों से पैदा हुई रूह को ठिकाना बनाया
मुहब्बत ने जालिम दुश्मन को हमदम बनाया
दिल धड़केगा कब तलक रूह फ़ना हो जाने दो
मासूम मुहब्बत को तल्ख सज़ा अब हो जाने दो

नासमझ मुहब्बत नियत समझी न जमाने की
जुर्म जुबाँ ने किया मुहब्बत देखी न दीवाने की
दिल ऐ ज़ाहिर मुहब्बत से बड़ी जुबाँ हो जाने दो
मासूम मुहब्बत को तल्ख सज़ा अब हो जाने दो

कीमत मिठास की हे कातिल मुहब्बत ज़हर हे
शब् मिल्कियत हमारी दुश्मन हर इक सहर हे
शब् ऐ रात पूनम की अब अमावस हो जाने दो
मासूम मुहब्बत को तल्ख सज़ा अब हो जाने दो

इज्जत लिबास की हे फकीर इश्क़ नाकदर हे
कोई साथ  न दे खालिश आइना हम सफर हे
नाकाफी हिज्रे दौलत भरी भीड़ में गुम हो जाने दो
मासूम मुहब्बत को तल्ख सज़ा अब हो जाने दो

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