सोमवार, 31 दिसंबर 2018

माहताब के माथे पे दिलकश

तेरी बेमिसाल मुस्कुराहटें उफ तेरा ये ताबिंदा जमाल
के बडा अजीब सा हो जाता है तुझे देखनेवालों का हाल

मौसम है गमका या कैफ का ये सवाल नही कोई सवाल
तेरी याद जब भी आती है आ जाता है लहू मे ऊबाल


माहताब के माथे पे दिलकश ख्वाबों का हो नज़ारा ज्युं
हर इक खुशी तो है बस तेरे लहराते दामन का कमाल

इश्क मे तेरे मैने अहा तुफां को साहिल पढ लिया
और दर्दको खुशियां समझ के खिचवा आया दिलकी खाल

रुत खिजांकी हो महका गुलाब खिल जाये गुलशनका शबाब
तु आ जाए इक लम्हेको गर और जो दे चमन पे निगाह डाल

... कार्ल मार्क्स हो गया हूं

कहां पूरा एटम था, अब क्वॉर्क्स हो गया हूं तेरी मोहब्बत में कार्ल मार्क्स हो गया हूं तेरा इश्क बुर्जुआ था, मैं रहा प्रॉलेटेरियट ही तू सोविय...