लिखूं क्या तुम्हे में,
समझ मुझको नही आता,
ये इश्क का दर्द मुझे
कुछ लिखने नही देता ,
सोचता हूँ नित्य
कहूँ कुछ शव्द तुमसे
मगर दिल मेरा ये
कुछ कहने नही देता ,
निहारता हूँ खुद को
जब आईने से रूबरू हो,
तेरा चेहरा मुझे
मेरा चेहरा दिखने नही देता ,
इश्क की आग में
जलता पतंगा बन gaya हूँ में,
ख्वाव भी तेरा मुझे
अब जीने नही देता ....
दाऊ जी
समझ मुझको नही आता,
ये इश्क का दर्द मुझे
कुछ लिखने नही देता ,
सोचता हूँ नित्य
कहूँ कुछ शव्द तुमसे
मगर दिल मेरा ये
कुछ कहने नही देता ,
निहारता हूँ खुद को
जब आईने से रूबरू हो,
तेरा चेहरा मुझे
मेरा चेहरा दिखने नही देता ,
इश्क की आग में
जलता पतंगा बन gaya हूँ में,
ख्वाव भी तेरा मुझे
अब जीने नही देता ....
दाऊ जी

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