बुधवार, 19 मार्च 2014

एक ग़ज़ल की तरह गुनगुनाता रहा

एक ग़ज़ल समझ गुनगुनाता रहा ,
उसके प्यार को पाना चाहता रहा ,
एक उम्र गुज़र गयी और क्या कह दूँ आज
प्यार को प्यार से प्यार करता रहा ,

लेंके उम्मीद एक मैं तो चलता रहा ,
एक पुष्प की तरह नित्य खिलता रहा ,
बुरा तो हुआ तब जब वो आई नही ,
वो समझ न सकी मैं महकता रहा ,

एक ग़ज़ल समझ गुनगुनाता रहा ,
उसके प्यार को पाना चाहता रहा ....

लेके एहसास एक उनके स्वप्नों से ,
एक छुयन को महसूस मैं करता रहा ,
वो आते रहे और जाते रहें
मैं नज़र भरके उनको देखता रहा ,
जिन गलिओं में था तेरा आना और जाना ,
सुबह शाम उनमे मैं फिरता रहा
उन गलिओं में जाता हूँ रोज़ सुबह
आज भी हो खड़ा राह तक हूँ रहा ,

एक ग़ज़ल की तरह गुनगुनाता रहा

उसका  प्यार पाना चाहता रहा.........

दाऊ जी 

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