एक ग़ज़ल समझ गुनगुनाता रहा ,
उसके प्यार को पाना चाहता रहा ,
एक उम्र गुज़र गयी और क्या कह दूँ आज
प्यार को प्यार से प्यार करता रहा ,
लेंके उम्मीद एक मैं तो चलता रहा ,
एक पुष्प की तरह नित्य खिलता रहा ,
बुरा तो हुआ तब जब वो आई नही ,
वो समझ न सकी मैं महकता रहा ,
एक ग़ज़ल समझ गुनगुनाता रहा ,
उसके प्यार को पाना चाहता रहा ....
लेके एहसास एक उनके स्वप्नों से ,
एक छुयन को महसूस मैं करता रहा ,
वो आते रहे और जाते रहें
मैं नज़र भरके उनको देखता रहा ,
जिन गलिओं में था तेरा आना और जाना ,
सुबह शाम उनमे मैं फिरता रहा
उन गलिओं में जाता हूँ रोज़ सुबह
आज भी हो खड़ा राह तक हूँ रहा ,
एक ग़ज़ल की तरह गुनगुनाता रहा
उसका प्यार पाना
चाहता रहा.........
दाऊ जी
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