एक पथिक की तरह रोज़ चल हूँ रहा ,
खुबुएं इस चमन की लेता जा हूँ रहा ,
हर रोज़ एक नया आशियाना यंहा ,
जिंदगी के सफ़र का आनदं ले हूँ रहा ,
कभी मंजिल ढूंडता,कभी रास्ता न मिला
ये सफ़र हैं हसीं,मज़ा ले हूँ रहा
न दौलत का वास्ता,न शौहरत का रास्ता
एक पुष्प की तरह महक फैला हूँ रहा ,
कोई न चाहत,न अरदास हैं ,
लोगों के चेहरे पर खुशियों की आस हैं ,
बांटता हूँ ज़ब मैं हर ज़गह मुस्कान को,
शायद इसलिए मैं मुस्कुरा हूँ रहा ,
एक पथिक की तरह रोज़
चल हूँ रहा ,
खुबुएं इस चमन की लेता जा हूँ रहा
हर रोज़ एक नया आशियाना यंहा ,
जिंदगी के सफ़र का आनदं ले
हूँ रहा,
दाऊ जी
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