बुधवार, 19 मार्च 2014

एक पथिक की तरह रोज़ चल हूँ रहा ,


एक पथिक की तरह रोज़ चल हूँ रहा ,
खुबुएं इस चमन की लेता जा हूँ रहा ,

हर रोज़ एक नया आशियाना यंहा ,
जिंदगी के सफ़र का आनदं ले हूँ रहा ,

कभी मंजिल ढूंडता,कभी रास्ता न मिला
ये सफ़र हैं हसीं,मज़ा ले हूँ रहा

न दौलत का वास्ता,न शौहरत का रास्ता
एक पुष्प की तरह महक फैला हूँ रहा ,

कोई न चाहत,न अरदास हैं ,
लोगों के चेहरे पर खुशियों की आस हैं ,

बांटता हूँ ज़ब मैं हर ज़गह मुस्कान को,
शायद इसलिए मैं मुस्कुरा हूँ रहा ,

 एक पथिक की तरह रोज़ चल हूँ रहा ,
खुबुएं इस चमन की लेता जा हूँ रहा 

हर रोज़ एक नया आशियाना यंहा ,
जिंदगी के सफ़र का आनदं ले हूँ रहा,

दाऊ जी 

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