मुझको ज़माने की अब ये दौलत नही जमती,
काली - कलूटी ये शोहरत नही ज़मती ,
मन में आता है करदूँ बगावत मैं यहाँ ,
सच में यारों अब मुझे ये दुनिया नही ज़मती ,
किसको सुनाऊं मैं हाल-ए-दिल अपना
किसको बताऊँ मैं दर्द-ए-दिल अपना
ज़ब ये सारा ज़हा हैं मतलवी मेरे यार
शायद इसलिए मेरी किसी से नही बनती
लेके अरमाँ में निकला था घर से
कहाँ और किस मोड़ पर हो गये है स्वाहा,
कुछ उम्मीदें आज भी जिंदा है दिल में
मगर स्वप्नों से उनकी बात नही बनती
मुझको ज़माने की ये दौलत नही ज़मती
काली कलूटी ये शौहरत नही ज़मती
दाऊ जी
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