रविवार, 9 मार्च 2014

आज तुम्हारे अतीत के पन्ने

आज तुम्हारे अतीत के पन्ने
पढकर मैने देखा
बहुत पढा साहित्य ग्रंथ और
अदभुत प्रेम की गाथाएँ
देवदास तो कुछ भी नहीं था
तुम्हारे निश्छल प्रेम के आगे
निश्चित हार के बावजूद
झंझावतों से संघर्ष किया
अपना सब कुछ गंवा  बैठे
 व्यथित मन की वेदना  को
 सहज ही पन्नों में उतार दिया
इस यथार्थ पात्र के प्रेम का चित्रण
  पढकर नैनो में  अश्रु भर आया
अश्कों को तब रोक ना पाई
याद आया 'कार्नेलिया का गीत'
अरूण यह मधुमय देश हमारा!
जहाँ पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा ....
बरसाती आँखों के बादल बनते
जहाँ भरे करूणा जल
 लहरें टकराती अनंत की
पाकर जहाँ किनारा...
तुम आज भी स्वर्ण की भांति
अतीत की हार से चमकते रहे
निराश जीवन मे आशा का,
संचार बखूबी जानते हो
सूर्य तेज की भांति तुम्हारे
इस चेहरे पर चिंता और व्याकुलता की
 लकीर नहीं मैं खुश हूँ कि तुम निरूद्देश्य नहीं
तुम दीपक बनकर दूसरों के
  जीवन को प्रकाशित करते हो

!"गायत्री शर्मा"  

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