मुझे फुरसत कहाँ खुद से मैं औसत आदमी हूँ,
गीत गाऊं वतन के कैसे? मैं औसत आदमी हूँ.
मेरा तो वक्त सब बर्बाद रोटी ही कमाने में,
कहाँ नारे लगाऊँ जाके, मैं औसत आदमी हूँ.
मुझ पे लागू हैं सब कानून दुनिया के मगर,
मेरे लिए कानून नहीं, मैं औसत आदमी हूँ.
बदल कितना गया कुछ आज के जमाने में,
मेरे लिए बदलेगा क्या? मैं औसत आदमी हूँ.
अब भी भूखा, अब भी प्यासा, और उरियाँ हूँ,
लुटरे मुल्क के देखो, मैं औसत आदमी हूँ.
हूँ सादिक मैं मगर अब भी ईमान पर अपने,
नहीं खाता हूँ आदमी, मैं औसत आदमी हूँ.
तुम्हारा क्या? तुम्हारी जात खास है, जरदारो,
मुल्क खा जाओगे मैं क्या? मैं औसत आदमी हूँ.
न आऊंगा मैं नज़रों में तुम्हारे, उरूजे-मकाम पर,
मगर दहशत तो है तुम्हें, मैं औसत आदमी हूँ.
हूँ मैं मजलूम मुद्दत से मगर अब चीखता नहीं,
है अब मेरी सदा बुलंद, मैं औसत आदमी हूँ.
हो तुम नेता या ताजिर, राहबर-ओ-राहजन कोई,
सबब फकरे-तुखम 'अली', मैं औसत आदमी हूँ.
ए.एस.खान जी
गीत गाऊं वतन के कैसे? मैं औसत आदमी हूँ.
मेरा तो वक्त सब बर्बाद रोटी ही कमाने में,
कहाँ नारे लगाऊँ जाके, मैं औसत आदमी हूँ.
मुझ पे लागू हैं सब कानून दुनिया के मगर,
मेरे लिए कानून नहीं, मैं औसत आदमी हूँ.
बदल कितना गया कुछ आज के जमाने में,
मेरे लिए बदलेगा क्या? मैं औसत आदमी हूँ.
अब भी भूखा, अब भी प्यासा, और उरियाँ हूँ,
लुटरे मुल्क के देखो, मैं औसत आदमी हूँ.
हूँ सादिक मैं मगर अब भी ईमान पर अपने,
नहीं खाता हूँ आदमी, मैं औसत आदमी हूँ.
तुम्हारा क्या? तुम्हारी जात खास है, जरदारो,
मुल्क खा जाओगे मैं क्या? मैं औसत आदमी हूँ.
न आऊंगा मैं नज़रों में तुम्हारे, उरूजे-मकाम पर,
मगर दहशत तो है तुम्हें, मैं औसत आदमी हूँ.
हूँ मैं मजलूम मुद्दत से मगर अब चीखता नहीं,
है अब मेरी सदा बुलंद, मैं औसत आदमी हूँ.
हो तुम नेता या ताजिर, राहबर-ओ-राहजन कोई,
सबब फकरे-तुखम 'अली', मैं औसत आदमी हूँ.
ए.एस.खान जी
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