मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

बह रहे अश्क हैं कोई रोक लो इन्हें,

बह रहे अश्क हैं कोई रोक लो इन्हें,
आके अपने हाथों से पौंछ दो इन्हें,

इससे पहले कि बह जाये सारा जहाँ,
आकर अपने हाथो से थाम लेना तुम हमें,

पागलपन हैं छाया,भटकता हूँ मैं,
तेरी गलियों में दिन रात टहलता हूँ मैं,

अब नही दिखता मुझको तेरा अक्श यहाँ,
खाली हैं खिड़की ,सूनापन हैं वहाँ,

इससे पहले की पागल कोई कह दे हमें,
आकर कोई तो सच बतलादे हमें,

हैं कहाँ वो जो दिखता नही मुझको है,
कोई तो ढूडकर पास हमारे लादो उन्हें,

बह रहे अश्क हैं कोई रोक लो इन्हें,
आके अपने हाथों से पौंछ दो इन्हें,

दाऊ जी*

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